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1000 महाभारत प्रश्नोत्तरी

राजेन्द्र प्रताप सिंह

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :164
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2613
आईएसबीएन :9788177212983

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इसमें 1000 महाभारत संबंधी प्रश्न तथा उनके उत्तर....

1000 Mahabharat Prashnottari - A quiz book on the story of Mahabharat in Hindi by Rajendra Pratap Singh - 1000 महाभारत प्रश्नोत्तरी - राजेन्द्र प्रताप सिंह

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

क्या आप जानते हैं-‘वह कौन पांडव वशंज था, जिसने एक बार अनजाने में भीम को मल्ल युद्ध में पराजित कर दिया था’, ‘धृतराष्ट्र का वह कौन पुत्र था, जो महाभारत युद्ध में जीवित बच गया था’, ‘किस वीर से युद्ध करते हुए अर्जुन की मृत्यु हो गई थी’, ‘द्रोपदी को ‘याज्ञशैनी’ क्यों कहते थे’, ‘हस्तिनापुर का नाम ‘हस्तिनापुर’ कैसे पड़ा’, ‘महाभारत युद्ध में कुल कितने योद्धा मारे गये थे’, ‘उस अस्त्र को क्या कहते हैं, जिसके प्रयोग करने पर पत्थरों की वर्षा होने लगती थी’, तथा ‘एक ब्रह्मास्त्र को दूसरे ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दबा देने से कितने वर्षों तक वर्षा नहीं होती थी ?’ यदि नहीं तो महाभारत प्रश्नोत्तरी पढ़ें। आपको इसमें इन सभी और ऐसे ही रोचक, रोमांचक जिज्ञासापूर्ण व खोजपरक 1000 प्रश्नों के उत्तर जानने को मिलेगें।

इस पुस्तक में भीष्म, द्रोण, कर्ण, अर्जुन, भीम एवं अभिमन्यु जैसे, पराक्रमियों के अद्भुत शौर्य का वर्णन तो है ही, विभिन्न शस्त्रास्त्रों, दिव्यास्त्रों एवं उनके और प्रयोगों के पश्चात् परिणामों की जानकारी भी दी गई है। इसके अतिरिक्त महाभारतकालीन नदियों, पर्वतों, राज्यों, नगरों, तथा राज्यधिपतियों का सुस्पष्ट संदर्भ भी जानने को मिलता है। साथ ही लगभग दो सौ विभिन्न पात्रों के माता, पिता, पत्नी, पुत्र-पुत्री, पितामह, पौत्र, नाना, मामा, आदि संबंधों का खोजपरक विवरण भी।

यह पुस्तक आम पाठकों के लिए तो महत्त्वपूर्ण है ही लेखकों, संपादकों, पत्रकारों, वक्ताओं, शोधार्थियों, शिक्षकों व विद्यार्थियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी है। वस्तुतः यह महाभारत का संदर्भ कोश है।

 

पुरोवाक्

 

 

भारतीय संस्कृति ज्ञान का भंडार है। माध्यम इसका संस्कृत भाषा है। प्रमुख विशेषता इसकी सहिष्णुता है। अपनी इसी विवशता के कारण हमारी संस्कृति विदेशी आक्रांताओं से काफी प्रभावित हुई है। आज हम किसी भी क्षेत्र में दृष्टिक्षेप करें तो बहुलांश में भारतीय संस्कृति ही दृष्टिगोचर होती है-चाहे वह राज-व्यवस्था का क्षेत्र हो, समाज-व्यवस्था का क्षेत्र हो, साहित्य का क्षेत्र हो अथवा विज्ञान का। राज-व्यवस्था के क्षेत्र में भारत (तत्कालीन आर्यावर्त) ही एकमात्र वह देश है, जहाँ मनुस्मृति से प्रारंभ होकर याज्ञवल्क्यस्मृति, नारदस्मृति, पाराशरस्मृति और कौटिल्यीय अर्थशास्त्र तक जो भी राजा, राजपरिषद्, राजकीय कर-विधान, दंड-व्यवस्था आदि के मानदंड दिए गए, वे आज भी लगभग संसार के सभी देशों के संविधान में किसी-न-किसी रूप में पाए जाते हैं। हाँ, यह अवश्य हुआ है कि उसमें यदि कुछ जोड़ा गया है, तो कुछ घटाया भी गया है। विज्ञान के क्षेत्र में भी देखें। आज से युगों पहले भगवान् श्रीराम लंका-विजय के पश्चात् पुष्पक विमान द्वारा अयोध्या प्रस्थान करते हैं, और रावण के विरुद्ध युद्ध में जिन प्रक्षेपास्त्रों का प्रयोग करते हैं, वे सभी आज के आयुधागारों में नाम और रूप बदलकर आधुनिक विज्ञान की देन बताए जा रहे हैं। महाभारत में धृतराष्ट्र को उनके मंत्री संजय हस्तिनापुर में ही बैठे हुए दिव्य दृष्टि से कुरुक्षेत्र युद्ध का वर्णन करते हैं।

तात्पर्य यह है कि कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं, जिसमें आधुनिकता का मूल भारतीय संस्कृति में विद्यमान न हो। हाँ, समय-समय पर विदेशी आक्रांताओं-शकों, हूणों, यवनों, मगलों-ने इसे छिन्न-भिन्न करने का पूरा प्रयास किया; परंतु संस्कृत भाषा में उनकी पूरी पैठ न होने के कारण वे पूर्णरूपेण सफल न हो सके। अठारहवीं शती में अंग्रेजों का आगमन इसके पूर्ण विनाश की पूर्व नियोजित योजना के साथ हुआ, जो विनाश करने में तो सफल नहीं हो पाए, हाँ, अपनी भाषा और संस्कृति को थोपने में अवश्य सफल हो गए। देश की शक्ति को क्षीण करने की उनकी यह योजना आज के भारतीय जनमानस में गहरे तक प्रवेश कर चुकी है।

हमारी प्राचीन संस्कृति और आज की पाश्चात्य सभ्यता में लिप्त भारतीय जनमानस के रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा, बोल-चाल और यहाँ तक कि अभिवादन के तौर-तरीके ध्यातव्य हैं। यही कारण है कि आज की पीढी़ अंग्रेजी भाषा-प्रयोग को आत्मगौरव का प्रतीक मानते हुए संस्कृत भाषा को हेय दृष्टि से देखने लगी है। उसे यह भी पता नहीं कि संस्कृत भाषा ही वह असीम सागर है, जिसमें गोते लगाकर रत्नों का ढेर निकाला जा सकता है। सागर में गोता लगाना और अथाह जल के तल तक पहुँचकर एकाध रत्न लेकर बाहर आना अत्यन्त दुष्कर कार्य तो है ही और जिसे मैं रत्नों का ढेर कह रहा हूँ उतने तक तो पहुँचने में तो अकल्पनीय श्रम, साहस और समय की आवश्यकता होती है; परंतु यह श्रम और साहस किया है नवोदित साहित्यकार श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह ने।

आज की युवा पीढ़ी से यदि पूछा जाए कि राजा दशरथ के कितने पुत्र थे और उनकी किस रानी के गर्भ में कौन सा पुत्र जनमा था, तो शायद ही कोई बता पाए; युवी पीढ़ी की बात छोड़िए, किसी विद्वन्मंडली में आप पूछ बैठें कि महाभारत युद्ध में पहले दिन कौरवों ने जिस व्यूह की रचनी की थी उसका नाम क्या था, अथवा अर्जुन का नाम ‘गुडाकोश’ क्यों पड़ा, तो लोग अपनी असमर्थता ही जताएँगे। राजेंद्रजी ने अपनी लघु वय में इतने श्रमसाध्य कार्य को करने का बीड़ा उठाया और इतने अल्प समय में एक-एक मोती चुनकर जिस माला का सृजन किया उसका नाम है- ‘1000 महाभारत प्रश्नोत्तरी’। ‘मोती की माल’ कहकर संभवत: मैं गलती कर रहा हूँ। यह तो ऐसा हार है, जिसमें भिन्न-भिन्न आकार और अनेक रूपों वाले रंग-बिरंगे रत्न पिरोए गए हैं, जिनकी छटा ही निराली है। महाभारत नामक सागर में गोता लगाने पर लेखक को जो रत्न मिले, वे हैं- ‘क्या नाम था’, ‘नामों की निर्मित’, ‘रोमांचक जानकारियाँ’, ‘संबंधों का सागर’, ‘संख्याओं को भी जानें’, ‘महत्त्वपूर्ण स्थान’, ‘किसने क्या कहा था’ तथा ‘वरदान और शाप’ आदि। यह पुस्तक न केवल विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए परीक्षापयोगी-शोधोपयोगी सिद्ध होगी अपितु विद्वानों और धार्मिक-पौराणिक चर्चा में रुचि रखने वाले सामान्य जनों के लिए भी ज्ञानवर्द्धक सिद्ध होगी।

श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह को मैं हार्दिक शुभाशिष् प्रेषित करते हुए माँ सरस्वती से यह प्रार्थना करता हूँ कि वह भविष्य में भी उन्हें इसी प्रकार की श्रेष्ठ कृतियों का सृजन करने की प्रेरणा प्रदान करें। अस्तु !

 

दिल्ली विजयादशमी, संवत् 2059

 

राज बली पांडेय

 

स्वकथ्य

 

 

महाभारत को ‘पंचम वेद’ कहा गया है। यह ग्रंथ हमारे देश के मन-प्राण में बसा हुआ है। यह भारत की राष्ट्रीय गाथा है। इस ग्रन्थ में तत्कालीन भारत (आर्यावर्त) का समग्र इतिहास वर्णित है। अपने आदर्श स्त्री-पुरुषों के चरित्रों से हमारे देश के जन-जीवन को यह प्रभावित करता रहा है। इसमें सैकड़ों पात्रों, स्थानों, घटनाओं तथा विचित्रताओं व विडंबनाओं का वर्णन है।

यद्यपि महाभारत के संबंध में, इसके इतिहास के संबंध में थोड़ा-बहुत जानने वालों की संख्या लाखों में है, तथापि बहुत कुछ जानना शेष रह जाता है। महाभारत जैसे विस्तृत कलेवर वाले ग्रन्थ का पाराणय कर आत्मसात् कर पाना श्रमसाध्य तो है ही, समयसाध्य भी है। ऐसे में एक ऐसी पुस्तक की आवश्यकता अनुभव होती है; जो अल्प समय में ही पाठकों को अपने विषय की केंद्रीय और महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान कर सके। इस दृष्टि से यह पुस्तक गागर में सागर है। वास्तव में महाभारत जैसा विषय एक ऐसे समुद्र की भाँति है, जिसमें जितने गहरे उतरते जाएँगे उतना ही प्राप्त होता जाएगा। यद्यपि महाभारत में अंतरंग में अपार ज्ञानराशि स्थित है, तथापि उस सबको एक स्थान पर उपस्थित कर पाना संभव नहीं, तथा तब तो यह और भी संभव नहीं, जब हम 1000 प्रश्नों की सीमा में बँधे हुए हों।

प्रस्तुत पुस्तक के प्रणयन का उद्देश्य ऐसे पाठकों को महाभारत संबंधी ज्ञान से संपन्न और समृद्ध कराना है, जो महाभारत के विषय में अभिरुचि रखते हैं और इसमें वर्णित घटनाओं, पात्रों एवं स्थानों तथा कथाओं-उपकथाओं के संबंध में अल्प समय में ही अधिकाधिक जानना चाहते हैं। यह पुस्तक पाठकों को बहुत सुगमता से महाभारत की प्रमुख घटनाओं और महत्त्वपूर्ण संदर्भों से तो परिचित कराती ही है, उसमें वर्णित रोचक, रोमांचक, जिज्ञासापूर्ण एवं आश्चर्यचकित कर देने वाले अनेकानेक संदर्भों की भी जानकारी प्रदान करती है।

प्रस्तुत पुस्तक में प्रश्नों को माध्यम से जहाँ एक ओर पितामाह, भीष्म, आचार्य द्रोण, कर्ण, अर्जुन, अभिमन्यु, अश्वत्थामा, धृष्टद्युम्न जैसे पराक्रमियों के अद्भुत व अलौकिक शौर्य तथा बल-विक्रम का वर्णन है वहीं दूसरी ओर महाभारत में वर्णित ऋषियों-मुनियों, देवर्षियों, राजर्षियों एवं महर्षियों के महान् व पवित्र चरित्रों का भी परिचय प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न शास्त्रास्त्रों, दिव्यास्त्रों एवं उनके प्रयोगों और प्रयोग के पश्चात् परिणामों की जानकारी के साथ ही महाभारतकालीन नदियों, पर्वतों, राज्यों, नगरों तथा राज्याधिपतियों का रोचक और सुस्पष्ट संदर्भ जानने को मिलता है। साथ ही लगभग दो सौ विभिन्न पात्रों के माता, पिता, पत्नी, पुत्र-पुत्री, पितामह, पौत्र, नाना, मामा आदि जैसे संबंधों का विस्तृत एवं खोजपरक विवरण भी। ‘क्या नाम था’, ‘रोमांचक जानकारियाँ’, ‘नामों की निर्मित’, ‘संबंधों का सागर’, ‘वरदान और शाप’, ‘काल के गाल में’ तथा ‘संख्याओं को भी जानें’ जैसे प्रमुख अधियायों सहित कुल चौदह अध्यायों में संग्रहीत 1000 प्रश्नों की यह पुस्तक वस्तुत: महाभारत से संबंधित संदर्भ कोश है। यह पुस्तक आम पाठकों के लिए तो महत्त्वपूर्ण है ही, लेखकों, संपादकों, पत्रकारों, वक्ताओं, शोधार्थियों, शिक्षकों व विद्यार्थियों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है।
पुस्तक के अन्त में तीन परिशिष्ट दिए गए हैं। परिशिष्ट-1 में ‘पांडवों और कौरवों का वंश-वृक्ष’, परिशिष्ट-2 में ‘महाराज धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों की सूची’ तथा परिशिष्ट-3 में ‘अक्षौहिणी सेना की रचना’ का वर्णन है। आशा है, तीनों परिशिष्ट पाठकों हेतु उपयोगी होंगे।

प्रस्तुत पुस्तक को तैयार करते समय प्रिय जीवनसंगिनी श्रीमती उषा सिंह ने जिस आत्मीयता से सहयोग दिया वह अविस्मरणीय रहेगा।

 

राजेन्द्र प्रताप सिंह

 

1
क्या नाम था

 

 

1. उस वन का क्या नाम था जिसे जलाकर पांडवों ने वहाँ इंद्रप्रस्थ नगर बसाया था ?
(क) काम्यक (ख) द्वैत
(ग) खांडव (घ) सौगंधिक

2. उस राक्षसी का क्या नाम था जिसने दो टुकड़ों में विभक्त शिशु जरासंघ को एक में जोड़ दिया था ?
(क) हिडिंबा (ख) कामकंटकटा
(ग) पूतना (घ) जरा

3. महाभारत युद्ध के अन्तिम दिन पराजित हो जाने के बाद दुर्योधन जिस सरोवर में जा छिपा था उसका क्या नाम था ?
(क) मानसरोवर (ख) ब्रह्म सरोवर
(ग) पुष्पक सरोवर (घ) द्वैपायन सरोवर

4. जिस बहेलिए के हाथों श्रीकृष्ण की मृत्यु हुई थी उसका क्या नाम था ?
(क) हिरण्यधनु (ख) निषध
(ग) जरा (घ) सुषेण

5. द्यूतक्रीड़ा हेतु कौरवों ने जो सभा (भवन) बनवाई थी उसका क्या नाम था ?
(क) वैदूर्यसभा (ख) सुधर्मा
(ग) तोरणस्फटिक (घ) शुभेच्छु


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